मेरा साहित्य योगेन्द्राश, मेरे काव्य जीवन कि वो यात्रा हैं जिसने मुझे कब योगेन्द्र से योगेन्द्राश में बदल दिया मुझे पता ही नहीं चला। मित्रों ये सब पलक झपकते ही नहीं हुआ हैं इसमें काफी सारा वक्त खपाया गया हैं जिसके उपरान्त मुझें ये साहित्य के मोती प्राप्त हुए हैं । मित्रो, अंत में मैं आप प्रबुद्ध जनों से यही उम्मीद करता हूँ कि आप के द्वारा मेरी साहित्य साधना का स्वागत एवं समादर होगा । धन्यवाद ।
Saturday, 28 November 2015
Friday, 27 November 2015
Thursday, 26 November 2015
Tuesday, 24 November 2015
लघुकथा एक परिचय- योगेन्द्राश
अगर बात लघुकथा की कि जाए
तो हम साधारण अर्थ में इसे कहानी का संक्षिप्त रूप कह सकते है। आज की इस
दौड़ती-भागती जिंदगी में लघुकथाओं ने क्या आम और क्या खास दोनो ही वर्गों में अपनी
एक विशिष्ट पैठ बनाई हैं ।
लघुकथाओं का कथानक साधारणतय: किसी विशिष्ट पल और उसके
संवाद को प्रदर्शित करता हैं । इसमें समान्यत: एक या दो पात्रो के माध्यम
से कथा की रचना की जाती हैं जो कभी काल्पनिक या कभी सच्ची घटना पर आधारित हो सकती
हैं ।
लेखन किसी भी विधा में किया
जाए उसका उद्देश्य समाज के भीतर नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक सरोकार को बल प्रदान
करना हैं । सामान्यत: लेखक अपनी लेखनी से
समाज के लोगो को सत्य एवं असत्य, धर्म एवं अधर्म, स्वार्थ एवं निस्वार्थ के मध्य
कि बारीक रेखा से परिचित कराता हैं । ठीक इसी प्रकार से कोई भी लघुकथा तब तक
साहित्यिक द्रष्टि से सफल नहीं मानी जा सकती हैं जब तक कि उसकी कथावस्तु शिक्षाप्रद न
हो ।
अन्य साहित्यक रचनाओं कि
भाँति लघुकथा का शीर्षक भी सटीक होना चाहिए जिससे कि पाठक के चित्त में रोचकता के
तत्व को जन्मां जा सके । किसी भी साहित्यक रचना का शीर्षक उसकी विषय-वस्तु को
दर्शाता हैं अतैव लेखक को शीर्षक का चुनाव उसकी रचना के भावार्थ के आधार पर ही
करना चाहिए ।
कहानी की भाँति लघुकथा के
पात्रो का नामकरण बड़ी ही सावधानी से करना चाहिए जिससे कथा कि रोचकता एवं सजीवता
बनी रहे; उदाहरण के तौर पर
ग्रामीण आंचल की किसी घटना को व्यक्त करने के लिए पात्रो का नामकरण ग्रामीण परिवेश
के आधार पर गढ़ा जाना चाहिए जिससे कि पाठक कथा कि सजीवता को महसूस कर सके ।
अगर इस सम्बन्ध में प्रश्न
किया जाए कि लघुकथा का आकार कितने शब्दो का होना चाहिए ? तो इसका उत्तर किसी भी तरह
से सरल न होगा.....कहीं भी इस सम्बन्ध में किसी भी प्रकार का वर्णन नहीं मिलता हैं
जो लघुकथा को किसी शाब्दिक सीमा में बाँधता हो । अत: इस आधार पर ये कहा जा सकता
है कि लघुकथा कितने भी शब्दों कि हो सकती हैं बस वो कहानी का रूप न लेने पाएं.....परन्तु
फिर भी मेरे विचार से किसी भी लघुकथा के सृजन हेतु अधिकतम पाँच सौ शब्द उचित होंगे
।
धन्यवाद !
Monday, 23 November 2015
Monday, 16 November 2015
भारत- मेरी प्रथम कविता
हिन्द कि हवाओं में,
अपनो कि दुआओं में,
देख लेती हूँ मैं सपने,
पेड़ कि छाँव में..।।
कौन हैं प्रतापी जो मुझको
हराएगा,
कौन हैं भला जो मुझे राह
से हटाएगा,
ह्रदय में बहती हैं मेरे पावन
गंगा,
तेरा पाप भला मेरा क्या कर
पाएगा..।।
मैं तो हूँ अँगवाड़ी सारे विश्व
कि,
हूँ दुलारी मैं तो तीनो समुद्र
कि,
खिलते हैं जहाँ प्रतिभाओं के
फूल,
मैं हूँ वो भाग्यशाली फूलवाड़ी
विश्व कि..।।
कौन हैं यहाँ जो मेरे सच को
झुठलाएगा,
कौन हैं भला जो मेरे गाँधी को
भुलाएगा,
विश्व आस्था का प्रतीक हूँ
मैं,
मेरे इस प्रतीक को कौन मिटा
पाएगा..।।
ये माना कि हथियार उठाती नहीं
मैं,
अकारण ही हिंसा फैलाती नहीं
मैं,
मगर बुझदिल समझने कि भूल
न करना,
यूँ ही हिमालय का टीका लगाती
नहीं मैं..।।
Saturday, 14 November 2015
कविता का शीर्षक- खुद में भगवान नजर आ जाए ।
पतझड़ पावन बहार हैं
खुला आसमां प्रेम दिखाए,
मगर ये सब बेकार हैं ।
यूँ समेट ली हैं ये दुनिया
मानव ने चौखाटे में,
अलग-अलग छड़ रंग दिखाए
नए-नए भिन्न मुखौटे में ।
फुदक रही ये
जीवन-धारा
इस सीमित गलियारे
में,
मानो पंक्षी घर बनाए
समंदर के सिरहाने
में ।
न प्रताप न संयम तुझमें
न प्रेम कि ज्वाला हैं,
जहाँ भी नजर उठाकर देखो
वहाँ गड़बड़ घोटाला हैं ।
जीवन में न रंग बचा
है
मानो फीका ये संसार
हैं,
छोटा सा परिवार
बनाकर
सोंचे जिम्मेदार हैं
।
यूँ जो अगर जिम्मेदारी
कर्तव्य समझ में आ जाए,
सच मान लो इस दुनिया में
राम, रहीम फिर आ जाए ।
तो कर वादा हे! मानव
अपने इस परिवार से,
सीमित से गलियार नहीं
इस पूरे संसार से ।
करे भला तू जाति का अपनी
मानव तेरी जाति हैं,
मानव का धर्म वहीं जिस
धर्म में विश्व शांति हैं ।
आँखो को जो ये पूरा संसार
नजर में आ जाए,
सच मान लो दुनिया में
इंसान नजर में आ जाए ।
फैल जाएगी प्यार-मोहब्बत
इस पूरे संसार में,
जो गर मानव को खुद में
भगवान नजर में आ जाए ।।
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