Tuesday, 24 November 2015

लघुकथा एक परिचय- योगेन्द्राश


अगर बात लघुकथा की कि जाए तो हम साधारण अर्थ में इसे कहानी का संक्षिप्त रूप कह सकते है। आज की इस दौड़ती-भागती जिंदगी में लघुकथाओं ने क्या आम और क्या खास दोनो ही वर्गों में अपनी एक विशिष्ट पैठ बनाई हैं ।

लघुकथाओं का कथानक साधारणतय: किसी विशिष्ट पल और उसके संवाद को प्रदर्शित करता हैं । इसमें समान्यत: एक या दो पात्रो के माध्यम से कथा की रचना की जाती हैं जो कभी काल्पनिक या कभी सच्ची घटना पर आधारित हो सकती हैं ।

लेखन किसी भी विधा में किया जाए उसका उद्देश्य समाज के भीतर नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक सरोकार को बल प्रदान करना हैं । सामान्यत: लेखक अपनी लेखनी से समाज के लोगो को सत्य एवं असत्य, धर्म एवं अधर्म, स्वार्थ एवं निस्वार्थ के मध्य कि बारीक रेखा से परिचित कराता हैं । ठीक इसी प्रकार से कोई भी लघुकथा तब तक साहित्यिक द्रष्टि से सफल नहीं मानी जा सकती हैं जब तक कि उसकी कथावस्तु शिक्षाप्रद न हो ।

अन्य साहित्यक रचनाओं कि भाँति लघुकथा का शीर्षक भी सटीक होना चाहिए जिससे कि पाठक के चित्त में रोचकता के तत्व को जन्मां जा सके । किसी भी साहित्यक रचना का शीर्षक उसकी विषय-वस्तु को दर्शाता हैं अतैव लेखक को शीर्षक का चुनाव उसकी रचना के भावार्थ के आधार पर ही करना चाहिए ।

कहानी की भाँति लघुकथा के पात्रो का नामकरण बड़ी ही सावधानी से करना चाहिए जिससे कथा कि रोचकता एवं सजीवता बनी रहे; उदाहरण के तौर पर ग्रामीण आंचल की किसी घटना को व्यक्त करने के लिए पात्रो का नामकरण ग्रामीण परिवेश के आधार पर गढ़ा जाना चाहिए जिससे कि पाठक कथा कि सजीवता को महसूस कर सके ।

अगर इस सम्बन्ध में प्रश्न किया जाए कि लघुकथा का आकार कितने शब्दो का होना चाहिए ? तो इसका उत्तर किसी भी तरह से सरल न होगा.....कहीं भी इस सम्बन्ध में किसी भी प्रकार का वर्णन नहीं मिलता हैं जो लघुकथा को किसी शाब्दिक सीमा में बाँधता हो । अत: इस आधार पर ये कहा जा सकता है कि लघुकथा कितने भी शब्दों कि हो सकती हैं बस वो कहानी का रूप न लेने पाएं.....परन्तु फिर भी मेरे विचार से किसी भी लघुकथा के सृजन हेतु अधिकतम पाँच सौ शब्द उचित होंगे ।

धन्यवाद !

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