मेरा साहित्य योगेन्द्राश, मेरे काव्य जीवन कि वो यात्रा हैं जिसने मुझे कब योगेन्द्र से योगेन्द्राश में बदल दिया मुझे पता ही नहीं चला। मित्रों ये सब पलक झपकते ही नहीं हुआ हैं इसमें काफी सारा वक्त खपाया गया हैं जिसके उपरान्त मुझें ये साहित्य के मोती प्राप्त हुए हैं । मित्रो, अंत में मैं आप प्रबुद्ध जनों से यही उम्मीद करता हूँ कि आप के द्वारा मेरी साहित्य साधना का स्वागत एवं समादर होगा ।
धन्यवाद ।
पाकिस्तान के सन्दर्भ में मेरी एक सूक्ति- योगेन्द्राश
काटते हो हमारे सर, क्या लज्जा हैं नहीं तुममे, जरा सा मान रखना सरहदो का सीख लो प्यारे, क्य़ूँ वार करते हो हमारी पीठ पर छुपके.... अगर औकात हैं तो आओ दिल्ली जीत लो प्यारे..।।
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