Saturday, 28 November 2015

नवगीत- योगेन्द्राश




नियती ने हमें 

मिलाया था,

नियती ने विरह

कराया हैं, इस 

नियती कि नियत

ने कितनो को खूब

रूलाया है, फिर मिलेंगे

जल्दी मिलेंगे इस

वादे से विदाई दी..

मगर इस नियती

कि नियत ने 

हमे केवल तन्हाई 

दी...।।

Friday, 27 November 2015

नवगीत- योगेन्द्राश



ले क्रोध की ज्वाला को फतह 

नहीं पायी जाती,

जंग के मैदान में दया दिखलाई

नहीं जाती,

इन कदमों को खींचकर कायरता

मत दिखलाओं तुम,

ये प्रेम का मैदान हैं सरपट बढ़ते 

जाओं तुम,

तुम्हारे प्रेम कि ताकत ही तुमको

फतह दिलाएगी,

एक जीते हुए इंसान को भला दुनिया

क्यों ठुकराएगी..।।



Thursday, 26 November 2015

सूक्ति- योगेन्द्राश


मैं निशब्द हूँ, स्तब्ध हूँ और

मैं मौन हूँ...।।

बिन तेरे इस दुनियाँ में

मैं सोचता हूँ,

कौन हूँ...।।

सूक्ति- योगेन्द्राश



समंदर से हारा नही जो,
                          
                       नदियो से वो हार आया....

अब तो बारिश भी हैं कहती,

                        कि तेरी औकात क्या हैं..।।


सूक्ति- योगेन्द्राश



मैं तुम्हे बस इतना चाहता हूँ.,

कि जवाब नहीं हैं....,

कितना चाहता हूँ..।।

Tuesday, 24 November 2015

पाकिस्तान के सन्दर्भ में मेरी एक सूक्ति- योगेन्द्राश



काटते हो हमारे सर,

क्या लज्जा हैं नहीं तुममे,

जरा सा मान रखना सरहदो

का सीख लो प्यारे,

क्य़ूँ वार करते हो हमारी

पीठ पर छुपके....

अगर औकात हैं तो आओ

दिल्ली जीत लो प्यारे..।।


लघुकथा एक परिचय- योगेन्द्राश


अगर बात लघुकथा की कि जाए तो हम साधारण अर्थ में इसे कहानी का संक्षिप्त रूप कह सकते है। आज की इस दौड़ती-भागती जिंदगी में लघुकथाओं ने क्या आम और क्या खास दोनो ही वर्गों में अपनी एक विशिष्ट पैठ बनाई हैं ।

लघुकथाओं का कथानक साधारणतय: किसी विशिष्ट पल और उसके संवाद को प्रदर्शित करता हैं । इसमें समान्यत: एक या दो पात्रो के माध्यम से कथा की रचना की जाती हैं जो कभी काल्पनिक या कभी सच्ची घटना पर आधारित हो सकती हैं ।

लेखन किसी भी विधा में किया जाए उसका उद्देश्य समाज के भीतर नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक सरोकार को बल प्रदान करना हैं । सामान्यत: लेखक अपनी लेखनी से समाज के लोगो को सत्य एवं असत्य, धर्म एवं अधर्म, स्वार्थ एवं निस्वार्थ के मध्य कि बारीक रेखा से परिचित कराता हैं । ठीक इसी प्रकार से कोई भी लघुकथा तब तक साहित्यिक द्रष्टि से सफल नहीं मानी जा सकती हैं जब तक कि उसकी कथावस्तु शिक्षाप्रद न हो ।

अन्य साहित्यक रचनाओं कि भाँति लघुकथा का शीर्षक भी सटीक होना चाहिए जिससे कि पाठक के चित्त में रोचकता के तत्व को जन्मां जा सके । किसी भी साहित्यक रचना का शीर्षक उसकी विषय-वस्तु को दर्शाता हैं अतैव लेखक को शीर्षक का चुनाव उसकी रचना के भावार्थ के आधार पर ही करना चाहिए ।

कहानी की भाँति लघुकथा के पात्रो का नामकरण बड़ी ही सावधानी से करना चाहिए जिससे कथा कि रोचकता एवं सजीवता बनी रहे; उदाहरण के तौर पर ग्रामीण आंचल की किसी घटना को व्यक्त करने के लिए पात्रो का नामकरण ग्रामीण परिवेश के आधार पर गढ़ा जाना चाहिए जिससे कि पाठक कथा कि सजीवता को महसूस कर सके ।

अगर इस सम्बन्ध में प्रश्न किया जाए कि लघुकथा का आकार कितने शब्दो का होना चाहिए ? तो इसका उत्तर किसी भी तरह से सरल न होगा.....कहीं भी इस सम्बन्ध में किसी भी प्रकार का वर्णन नहीं मिलता हैं जो लघुकथा को किसी शाब्दिक सीमा में बाँधता हो । अत: इस आधार पर ये कहा जा सकता है कि लघुकथा कितने भी शब्दों कि हो सकती हैं बस वो कहानी का रूप न लेने पाएं.....परन्तु फिर भी मेरे विचार से किसी भी लघुकथा के सृजन हेतु अधिकतम पाँच सौ शब्द उचित होंगे ।

धन्यवाद !

सूक्ति- योगेन्द्राश




सूर्य का बेटा हूँ

इसलिए माँगता

हूँ रौशनी....

पर अँधेरे बादलो

ने मेरी बिल्कुल

न सुनी...।।

-------©योगेन्द्र सिंह योगेन्द्राश -------

Monday, 23 November 2015

सूक्ति- योगेन्द्राश

     


मेरी परछाईयों में तुम झलक


आते हो सुबह-शाम...,

अगर तू हैं वैदेही,

तो मै भी हूँ....

तेरा श्री राम..।।

सूक्ति- योगेन्द्राश



जब मानव रंग

दिखाता हैं 

मुखौटा भी 

शरमाता हैं...

सब लज्जाएं 

झुकती हैं

जब मानव

धर्म भुलाता

हैं...।।


Monday, 16 November 2015

भारत- मेरी प्रथम कविता


   
हिन्द कि हवाओं में,
अपनो कि दुआओं में,
देख लेती हूँ मैं सपने,
पेड़ कि छाँव में..।।

कौन हैं प्रतापी जो मुझको
हराएगा,
कौन हैं भला जो मुझे राह
से हटाएगा,
ह्रदय में बहती हैं मेरे पावन
गंगा,
तेरा पाप भला मेरा क्या कर
पाएगा..।।

मैं तो हूँ अँगवाड़ी सारे विश्व
कि,
हूँ दुलारी मैं तो तीनो समुद्र
कि,
खिलते हैं जहाँ प्रतिभाओं के
फूल,
मैं हूँ वो भाग्यशाली फूलवाड़ी
विश्व कि..।।

कौन हैं यहाँ जो मेरे सच को
झुठलाएगा,
कौन हैं भला जो मेरे गाँधी को
भुलाएगा,
विश्व आस्था का प्रतीक हूँ
मैं,
मेरे इस प्रतीक को कौन मिटा
पाएगा..।।

ये माना कि हथियार उठाती नहीं
मैं,
अकारण ही हिंसा फैलाती नहीं
मैं,
मगर बुझदिल समझने कि भूल
न करना,
यूँ ही हिमालय का टीका लगाती

नहीं मैं..।।

मेरी प्रणय यात्रा- योगेन्द्राश


पेड़ कि परछाई में,

धूप में तन्हाई में,

रात में अंगडाई में,

देखा था जो सपना...,

पूरा न हुआ...।।

चंदा का मिलन सूरज

से....

पूरा न हुआ...।।

धरती का मिलन अम्बर

से....

पूरा न हुआ वो आखरी 

पन्ना...

बस! वो आखरी पन्ना 

प्रेम का...।।

पूरा न हुआ हमसे...।।

Saturday, 14 November 2015

कविता का शीर्षक- खुद में भगवान नजर आ जाए ।


चार दिवारी दुनिया तेरी,
पतझड़ पावन बहार हैं
खुला आसमां प्रेम दिखाए,
मगर ये सब बेकार हैं ।
          यूँ समेट ली हैं ये दुनिया
          मानव ने चौखाटे में,
          अलग-अलग छड़ रंग दिखाए
          नए-नए भिन्न मुखौटे में ।
फुदक रही ये जीवन-धारा
इस सीमित गलियारे में,
मानो पंक्षी घर बनाए
समंदर के सिरहाने में ।
          न प्रताप न संयम तुझमें
          न प्रेम कि ज्वाला हैं,
          जहाँ भी नजर उठाकर देखो
          वहाँ गड़बड़ घोटाला हैं ।
जीवन में न रंग बचा है
मानो फीका ये संसार हैं,
छोटा सा परिवार बनाकर
सोंचे जिम्मेदार हैं ।
          यूँ जो अगर जिम्मेदारी
          कर्तव्य समझ में आ जाए,
          सच मान लो इस दुनिया में
          राम, रहीम फिर आ जाए ।
तो कर वादा हे! मानव
अपने इस परिवार से,
सीमित से गलियार नहीं
इस पूरे संसार से ।
         करे भला तू जाति का अपनी
         मानव तेरी जाति हैं,
         मानव का धर्म वहीं जिस
         धर्म में विश्व शांति हैं ।
आँखो को जो ये पूरा संसार
नजर में आ जाए,
सच मान लो दुनिया में
इंसान नजर में आ जाए ।
         फैल जाएगी प्यार-मोहब्बत
         इस पूरे संसार में,
         जो गर मानव को खुद में
         भगवान नजर में आ जाए ।।