Tuesday, 24 November 2015

सूक्ति- योगेन्द्राश




सूर्य का बेटा हूँ

इसलिए माँगता

हूँ रौशनी....

पर अँधेरे बादलो

ने मेरी बिल्कुल

न सुनी...।।

-------©योगेन्द्र सिंह योगेन्द्राश -------

Monday, 23 November 2015

सूक्ति- योगेन्द्राश

     


मेरी परछाईयों में तुम झलक


आते हो सुबह-शाम...,

अगर तू हैं वैदेही,

तो मै भी हूँ....

तेरा श्री राम..।।

सूक्ति- योगेन्द्राश



जब मानव रंग

दिखाता हैं 

मुखौटा भी 

शरमाता हैं...

सब लज्जाएं 

झुकती हैं

जब मानव

धर्म भुलाता

हैं...।।


Monday, 16 November 2015

भारत- मेरी प्रथम कविता


   
हिन्द कि हवाओं में,
अपनो कि दुआओं में,
देख लेती हूँ मैं सपने,
पेड़ कि छाँव में..।।

कौन हैं प्रतापी जो मुझको
हराएगा,
कौन हैं भला जो मुझे राह
से हटाएगा,
ह्रदय में बहती हैं मेरे पावन
गंगा,
तेरा पाप भला मेरा क्या कर
पाएगा..।।

मैं तो हूँ अँगवाड़ी सारे विश्व
कि,
हूँ दुलारी मैं तो तीनो समुद्र
कि,
खिलते हैं जहाँ प्रतिभाओं के
फूल,
मैं हूँ वो भाग्यशाली फूलवाड़ी
विश्व कि..।।

कौन हैं यहाँ जो मेरे सच को
झुठलाएगा,
कौन हैं भला जो मेरे गाँधी को
भुलाएगा,
विश्व आस्था का प्रतीक हूँ
मैं,
मेरे इस प्रतीक को कौन मिटा
पाएगा..।।

ये माना कि हथियार उठाती नहीं
मैं,
अकारण ही हिंसा फैलाती नहीं
मैं,
मगर बुझदिल समझने कि भूल
न करना,
यूँ ही हिमालय का टीका लगाती

नहीं मैं..।।

मेरी प्रणय यात्रा- योगेन्द्राश


पेड़ कि परछाई में,

धूप में तन्हाई में,

रात में अंगडाई में,

देखा था जो सपना...,

पूरा न हुआ...।।

चंदा का मिलन सूरज

से....

पूरा न हुआ...।।

धरती का मिलन अम्बर

से....

पूरा न हुआ वो आखरी 

पन्ना...

बस! वो आखरी पन्ना 

प्रेम का...।।

पूरा न हुआ हमसे...।।

Saturday, 14 November 2015

कविता का शीर्षक- खुद में भगवान नजर आ जाए ।


चार दिवारी दुनिया तेरी,
पतझड़ पावन बहार हैं
खुला आसमां प्रेम दिखाए,
मगर ये सब बेकार हैं ।
          यूँ समेट ली हैं ये दुनिया
          मानव ने चौखाटे में,
          अलग-अलग छड़ रंग दिखाए
          नए-नए भिन्न मुखौटे में ।
फुदक रही ये जीवन-धारा
इस सीमित गलियारे में,
मानो पंक्षी घर बनाए
समंदर के सिरहाने में ।
          न प्रताप न संयम तुझमें
          न प्रेम कि ज्वाला हैं,
          जहाँ भी नजर उठाकर देखो
          वहाँ गड़बड़ घोटाला हैं ।
जीवन में न रंग बचा है
मानो फीका ये संसार हैं,
छोटा सा परिवार बनाकर
सोंचे जिम्मेदार हैं ।
          यूँ जो अगर जिम्मेदारी
          कर्तव्य समझ में आ जाए,
          सच मान लो इस दुनिया में
          राम, रहीम फिर आ जाए ।
तो कर वादा हे! मानव
अपने इस परिवार से,
सीमित से गलियार नहीं
इस पूरे संसार से ।
         करे भला तू जाति का अपनी
         मानव तेरी जाति हैं,
         मानव का धर्म वहीं जिस
         धर्म में विश्व शांति हैं ।
आँखो को जो ये पूरा संसार
नजर में आ जाए,
सच मान लो दुनिया में
इंसान नजर में आ जाए ।
         फैल जाएगी प्यार-मोहब्बत
         इस पूरे संसार में,
         जो गर मानव को खुद में
         भगवान नजर में आ जाए ।।