Saturday, 14 November 2015

कविता का शीर्षक- खुद में भगवान नजर आ जाए ।


चार दिवारी दुनिया तेरी,
पतझड़ पावन बहार हैं
खुला आसमां प्रेम दिखाए,
मगर ये सब बेकार हैं ।
          यूँ समेट ली हैं ये दुनिया
          मानव ने चौखाटे में,
          अलग-अलग छड़ रंग दिखाए
          नए-नए भिन्न मुखौटे में ।
फुदक रही ये जीवन-धारा
इस सीमित गलियारे में,
मानो पंक्षी घर बनाए
समंदर के सिरहाने में ।
          न प्रताप न संयम तुझमें
          न प्रेम कि ज्वाला हैं,
          जहाँ भी नजर उठाकर देखो
          वहाँ गड़बड़ घोटाला हैं ।
जीवन में न रंग बचा है
मानो फीका ये संसार हैं,
छोटा सा परिवार बनाकर
सोंचे जिम्मेदार हैं ।
          यूँ जो अगर जिम्मेदारी
          कर्तव्य समझ में आ जाए,
          सच मान लो इस दुनिया में
          राम, रहीम फिर आ जाए ।
तो कर वादा हे! मानव
अपने इस परिवार से,
सीमित से गलियार नहीं
इस पूरे संसार से ।
         करे भला तू जाति का अपनी
         मानव तेरी जाति हैं,
         मानव का धर्म वहीं जिस
         धर्म में विश्व शांति हैं ।
आँखो को जो ये पूरा संसार
नजर में आ जाए,
सच मान लो दुनिया में
इंसान नजर में आ जाए ।
         फैल जाएगी प्यार-मोहब्बत
         इस पूरे संसार में,
         जो गर मानव को खुद में
         भगवान नजर में आ जाए ।।


2 comments:

  1. योगेन्द्राश भाई ये कविता सभी को जरूर से पढ़नी चाहिए......आपने जीवन जीने का पूरा-पूरा सार समझा दिया हैं...वाकई में अगर हर व्यक्ति खुद में भगवान ढूड़ने लग जाए तो समाज कि आधे से ज्यादा बुराईयाँ तो खुद पर खुद समाप्त हो जाए ।
    दिल कि गहराईयों से इस कविता को प्रणाम ।

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  2. बहुत अच्छे श्रीमान इस कविता को पढ़ने के बाद एेसा लगा कि जैसे गीता के श्लोक पढ़ रहा हूँ भाईसाहब आपको ह्रदय कि गहराईयों से धन्यवाद ।

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