हिन्द कि हवाओं में,
अपनो कि दुआओं में,
देख लेती हूँ मैं सपने,
पेड़ कि छाँव में..।।
कौन हैं प्रतापी जो मुझको
हराएगा,
कौन हैं भला जो मुझे राह
से हटाएगा,
ह्रदय में बहती हैं मेरे पावन
गंगा,
तेरा पाप भला मेरा क्या कर
पाएगा..।।
मैं तो हूँ अँगवाड़ी सारे विश्व
कि,
हूँ दुलारी मैं तो तीनो समुद्र
कि,
खिलते हैं जहाँ प्रतिभाओं के
फूल,
मैं हूँ वो भाग्यशाली फूलवाड़ी
विश्व कि..।।
कौन हैं यहाँ जो मेरे सच को
झुठलाएगा,
कौन हैं भला जो मेरे गाँधी को
भुलाएगा,
विश्व आस्था का प्रतीक हूँ
मैं,
मेरे इस प्रतीक को कौन मिटा
पाएगा..।।
ये माना कि हथियार उठाती नहीं
मैं,
अकारण ही हिंसा फैलाती नहीं
मैं,
मगर बुझदिल समझने कि भूल
न करना,
यूँ ही हिमालय का टीका लगाती
नहीं मैं..।।

ये माना कि हथियार उठाती नहीं
ReplyDeleteमैं,
अकारण ही हिंसा फैलाती नहीं
मैं,
मगर बुझदिल समझने कि भूल
न करना,
यूँ ही हिमालय का टीका लगाती
नहीं मैं..।।
बहुत अच्छे योगेन्द्राश भाई ।
यूँ ही तहलका मचाते रहे हो भाईजान ।
ReplyDeleteधन्यवाद आदरणीय दिग्विजय जी मुझे अपना प्यार प्रेषित करने के लिए ।
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